यह अकबर और बीरबल की कहानी हमें सिखाती है कि हर समस्या का समाधान बल से नहीं, बल्कि बुद्धि और सही सोच से होता है। यह एक प्रेरणादायक नैतिक कहानी है।
अकबर और बीरबल की रोचक कहानी: जब बुद्धि से शेर गायब हुआ | Moral Story in Hindi
एक बार की बात है। हमेशा की तरह बादशाह अकबर का दरबार सजा हुआ था। वे अपने सभी मंत्रियों के साथ राज्य के कार्यों पर चर्चा कर रहे थे। तभी अचानक द्वारपाल ने आकर सूचना दी कि पड़ोसी देश के राजा का एक राजदूत बादशाह से मिलने आया है।
बादशाह अकबर की आज्ञा से उस राजदूत को दरबार में बुलाया गया। राजदूत ने झुककर बादशाह को प्रणाम किया
और अपने राजा की ओर से दिया गया संदेश-पत्र अकबर को सौंप दिया। यह पत्र असल में एक चुनौती थी।
राजदूत अपने साथ कुछ उपहार भी लाया था और साथ ही एक बड़ा सा पिंजरा भी लाया गया। उस पिंजरे के अंदर एक शेर बंद था। देखने में वह बिल्कुल असली शेर जैसा लग रहा था।
राजदूत बोला,
“महाराज, मेरे राजा ने आपके लिए यह उपहार और एक चुनौती भेजी है। चुनौती यह है कि इस पिंजरे को हाथ लगाए बिना और शेर को छुए बिना, शेर को पिंजरे से गायब करना होगा।”
उसने आगे कहा,
“केवल तीन मौके दिए जाएँगे और हर दरबारी को सिर्फ एक ही मौका मिलेगा।”
यह सुनकर पूरा दरबार हैरान रह गया। सभी सोचने लगे कि बिना पिंजरा छुए और बिना शेर को हाथ लगाए यह काम कैसे संभव हो सकता है।
बादशाह अकबर ने पहले की तरह अपने सबसे बुद्धिमान दरबारी बीरबल की ओर देखा और कहा,
“बीरबल, इस चुनौती को सुलझाओ।”
तभी एक मंत्री अपनी जगह से खड़ा हुआ और नाराज़ होकर बोला,
“महाराज, आप हर बार केवल बीरबल को ही मौका क्यों देते हैं? इस बार किसी और दरबारी को भी अवसर मिलना चाहिए।”
अकबर ने उसकी बात मान ली और कहा,
“ठीक है, पहले अन्य दरबारी प्रयास करें।”
जिस दरबारी को पहला मौका मिला, उसने खुद पर भरोसा करने के बजाय किसी और की सहायता लेने का विचार किया। उसने दरबार में एक जादूगर को बुलाया और उसकी मदद से यह काम करने लगा। जादूगर ने कई तरह के जादू दिखाए, मंत्र पढ़े, लेकिन शेर अपनी जगह से नहीं हिला। पहला प्रयास असफल हो गया।
इसके बाद दूसरे दरबारी ने कहा,
“महाराज, मैं इस पहेली को सुलझा सकता हूँ।”
अकबर ने उसे भी अनुमति दे दी। उसने एक तांत्रिक को बुलाया। तांत्रिक ने तंत्र-मंत्र किया, झाड़-फूँक की, लेकिन परिणाम वही रहा। शेर पिंजरे में ही बैठा रहा। दूसरा प्रयास भी व्यर्थ चला गया।
अब दो मौके समाप्त हो चुके थे। तीसरा और अंतिम मौका बचा था। बादशाह अकबर की दृष्टि अब बीरबल पर टिक गई। यदि यह मौका भी व्यर्थ चला जाता, तो दूसरे देश के सामने अकबर के दरबार की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचती।
अकबर के संकेत पर बीरबल अपनी जगह से उठे और सीधे पिंजरे के पास गए। उन्होंने कुछ क्षण तक पिंजरे और शेर को ध्यान से देखा। फिर विनम्रता से बादशाह से बोले,
“महाराज, यदि आपकी अनुमति हो तो मुझे इस कार्य के लिए दो गर्म लोहे की सलाखें चाहिए।”
अकबर ने तुरंत आदेश दिया और बीरबल के लिए दो गर्म लोहे की सलाखें मँगवाई गईं।
बीरबल ने उन सलाखों को पिंजरे के पास ले जाकर शेर की ओर बढ़ाया। जैसे ही गर्म सलाखें शेर के पास पहुँचीं, वह पिघलने लगा। कुछ ही क्षणों में शेर पूरी तरह समाप्त हो गया।
यह दृश्य देखकर सभी दरबारी हैरान रह गए। वे सोचने लगे कि जो काम जादूगर और तांत्रिक मिलकर भी नहीं कर पाए, वह बीरबल ने कैसे कर दिया।
उत्सुक होकर बादशाह अकबर ने पूछा,
“बीरबल, तुमने यह कैसे किया?”
बीरबल ने विनम्रता से उत्तर दिया,
“महाराज, इसमें कोई जादू नहीं था। पहले यह समझना आवश्यक था कि पिंजरा कैसा है और उसमें रखा शेर कैसा है। जब मैंने ध्यान से देखा, तो मुझे पता चला कि यह शेर मोम का बना हुआ है। इसलिए मैंने गर्म लोहे की सलाखों से उसे पिघला दिया।”
यह सुनकर सभी दरबारी बीरबल के लिए तालियाँ बजाने लगे। बादशाह अकबर भी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि बीरबल ने दूसरे देश के सामने सल्तनत का मान बनाए रखा।
कहानी की शिक्षा
“हर समस्या का समाधान शक्ति से नहीं, बल्कि बुद्धि और सही सोच से होता है।”


0 टिप्पणियाँ