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| महर्षि मांडव्य की कहानी: न्याय, धर्म और आम आदमी का संघर्ष |
राजा के सैनिकों ने उन्हें चोर समझ लिया था, जबकि सच्चाई यह थी कि महर्षि मांडव्य पूरी तरह निर्दोष थे। लेकिन मांडव्य कोई साधारण व्यक्ति नहीं थे। उनके पास तपस्या की शक्ति, धर्म का बल और योग-साधना का प्रभाव था। इसी दिव्य शक्ति के कारण वे अपने प्राण बचा सके और स्वयं को निर्दोष सिद्ध कर पाए।
लेकिन बड़ा सवाल यह है—
क्या हर निर्दोष व्यक्ति के पास मांडव्य जैसी शक्ति होती है?
यही प्रश्न इस कथा को आज के समाज से जोड़ देता है।
महर्षि मांडव्य और धर्मराज विदुर का रहस्य
टीवी पर प्रसारित रामायण और महाभारत के अनुसार, जब भगवान श्रीकृष्ण ने कंस का वध किया, तब कंस के ससुर महाराज जरासंध ने मथुरा पर आक्रमण करने का निर्णय लिया।
इस संकट के समय मथुरा के राजा महाराज अग्रसेन ने हस्तिनापुर (जहां कौरव और पांडव रहते थे) से सहायता मांगने के लिए अपने राजदूत अक्रूर को भेजा।
राजदूत अक्रूर के प्रस्थान से पहले भगवान श्रीकृष्ण उनसे मिले और बोले—
“अक्रूर जी, जिनके पास आप जा रहे हैं, उनसे संकट की घड़ी में सहायता की उम्मीद न करें।
लेकिन मेरी ओर से मेरी प्रिय बुआ कुंती और मेरे परम भक्त धर्मराज विदुर से अवश्य मिलना।”
यह सुनकर अक्रूर चकित हो गए और पूछा—
“प्रभु, आप विदुर को धर्मराज क्यों कह रहे हैं?”
तब श्रीकृष्ण ने बताया कि—
धर्मराज विदुर का जन्म कैसे हुआ?
महर्षि मांडव्य ने यमराज को एक श्राप दिया था, जिसके कारण यमराज को शूद्राणी दासी की कोख से जन्म लेना पड़ा। वही यमराज आगे चलकर विदुर के रूप में अवतरित हुए।
इस प्रकार विदुर वास्तव में धर्मराज यम का ही अवतार थे।
न्याय व्यवस्था और आम आदमी की सच्चाई
जब न्याय की बात आती है, तो महर्षि मांडव्य जैसे महान तपस्वी को भी कानून के जाल में फंसा दिया गया था। फर्क बस इतना था कि—
महर्षि के पास योग शक्ति थी
आम आदमी के पास केवल कानून और उम्मीद
महर्षि मांडव्य स्वयं को निर्दोष सिद्ध कर पाए, लेकिन एक साधारण नागरिक के लिए ऐसा कर पाना बेहद कठिन होता है।
महर्षि मांडव्य के साथ क्या हुआ था?
महर्षि मांडव्य खंडव वन में निवास करते थे। उस समय जंगलों में डाकुओं का आतंक था। वे व्यापारियों को लूटते और उनकी हत्या कर देते थे।
व्यापारियों की शिकायत पर राजा के सैनिक व्यापारी के वेश में जंगल में गए। वहां डाकुओं से उनकी मुठभेड़ हुई। लेकिन परिस्थितियां ऐसी बनीं कि बिना सही जांच के दोष महर्षि मांडव्य पर डाल दिया गया।
यहीं से शुरू होती है न्याय बनाम शक्ति की वह कहानी, जो आज भी उतनी ही प्रासंगिक है।
निष्कर्ष (Conclusion)
महर्षि मांडव्य की कथा केवल एक पौराणिक घटना नहीं है, बल्कि यह हमें सोचने पर मजबूर करती है—
क्या आज का कानून सच में सबके लिए समान है?
क्या हर निर्दोष को न्याय मिल पाता है?
और क्या आम आदमी के पास अपने बचाव के लिए पर्याप्त साधन हैं?
यह कहानी हमें याद दिलाती है कि न्याय केवल कानून से नहीं, बल्कि संवेदना और सत्य से चलता है।

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