POS मशीन और 90 दिन का स्टॉक नियम क्या है? खाद की कमी की असली वजह?

खाद की कमी और POS मशीन से यूरिया बिक्री का सिस्टम भारत में


खाद की कमी क्यों होती है? – किसान, दुकानदार और कंपनी की असली सच्चाई

हर साल जब रबी या खरीफ का मौसम आता है, तो एक ही सवाल उठता है –

“खाद की कमी क्यों हो जाती है?”

किसान दुकान पर जाता है तो दुकानदार कहता है – “आज खाद नहीं है।”

किसान सोचता है कि दुकानदार जानबूझकर रोक रहा है।

दुकानदार सोचता है कि किसान बेवजह ज्यादा मांग कर रहा है।

और कंपनी कहती है कि सरकार से सब्सिडी समय पर नहीं मिल रही।

असल सच्चाई इन तीनों के बीच कहीं छुपी हुई है।

पहले क्या होता था:

पहले किसान पैसे देता था और खाद ले जाता था।

कोई मशीन नहीं, कोई आधार नहीं, कोई फसल पंजीकरण नहीं।

इस कारण कई जगह कालाबाजारी होती थी।

कुछ लोग जरूरत से ज्यादा खाद उठाकर जमा कर लेते थे फिर ऊँचे दामों पर बेचते थे

इसी गड़बड़ी को रोकने के लिए सरकार ने डीबीटी और मशीन वाला सिस्टम शुरू किया।

1. सरकार की ढील और सब्सिडी की समस्या

अगर हम खाद कंपनी की बात करे तो उनका कहना होता है की वो बाहर से खाद लाने तो तैयार है अगर सरकार उनकी सब्सिडी देकर मदद करे तो अगर सरकार अच्छी सब्सिडी देकर मदद करे।”

इसका मतलब साफ है –

👉 कंपनियां खाद मंगाना चाहती हैं

👉 लेकिन सरकार की सब्सिडी और नियमों की वजह से रुकावट आती है

👉 इसी कारण सप्लाई कम पड़ जाती है

यही खाद की कमी का पहला बड़ा कारण है।

2. कोरोना और देशों के युद्ध का असर

बीच में कोरोना महामारी आई।

कई देशों में फैक्ट्री बंद हुई।

जहाज चलना बंद हो गए।

फिर उसके बाद कई देशों में युद्ध शुरू हुए।

भारत में: – डीएपी

– पोटाश और कई कच्चा माल बाहर से आयात होता है।

जब: – जहाज देर से आते हैं

– रास्ते बंद हो जाते हैं

– माल अटक जाता है तो भारत में खाद कम पहुंचती है।

और किसान को लगता है –“खाद नहीं है।”

यही दूसरा बड़ा कारण है।

3. डीएपी और पोटाश महंगी, यूरिया सस्ती क्यों?

आज: – डीएपी महंगी हो गई

– पोटाश महंगी हो गई

– लेकिन यूरिया का रेट आज भी 266 रुपये पर अटका हुआ है

अब सवाल उठता है:  डीएपी और पोटाश के रेट बढ़ सकते हैं

 लेकिन यूरिया के क्यों नहीं?

असल सच्चाई यह है: यूरिया सबसे ज्यादा बिकने वाली खाद है।

इस पर सरकार सबसे ज्यादा सब्सिडी देती है।

लेकिन: – जब लागत बढ़ती है और रेट वही 266 रहता है

तो: - कंपनी को नुकसान होता है, कंपनी कम माल बनाती है

सप्लाई घट जाती है, बाजार में कमी बन जाती है

4. ब्लैक में यूरिया क्यों बिकती है?

जब बाजार में कमी होती है,तो मजबूरी में किसान को ब्लैक में यूरिया लेनी पड़ती है।

सरकारी रेट: 266 रुपये

ब्लैक में: 350–400 रुपये(हम इसका दावा नहीं करते ये सुनी सुनाई बात है )

यानी: - किसान ज्यादा देता है

- सरकार की सब्सिडी बेकार जाती है,  सिस्टम पर भरोसा टूटता है

अगर सरकार: यूरिया का रेट 266 से बढ़ाकर मान लो 350 कर दे

और जो फायदा हो वो कंपनी को सब्सिडी में दे दे तो:-

यूरिया की कमी, किसान लाइन में और POS मशीन पर आउट ऑफ स्टॉक संदेश



तो: ✔️ कंपनी ज्यादा माल आयात कर पाएगी

✔️ आयात बढ़ेगा

✔️ सप्लाई सुधरेगी

✔️ ब्लैक मार्केट कम होगी

✔️ कमी घटेगी

5. मशीन और सिस्टम की मजबूरी

आज खाद मिलती है: – आधार से

– अंगूठे से

– मशीन से

– पोर्टल से

अगर: – इंटरनेट नहीं चला

– मशीन खराब हुई

– अंगूठा नहीं लगा

तो: 👉 स्टॉक होते हुए भी बिक्री नहीं होती

👉 कंपनी को सब्सिडी नहीं मिलती

👉 अगला माल रोक दिया जाता है

इससे बाजार में कमी दिखने लगती है।

6. एक साथ ज्यादा मांग

जब: – गेहूं बोना होता है

– धान लगाना होता है

– सरसों या कपास बोनी होती है

तो हजारों किसान एक साथ खाद लेने आते हैं।कंपनी इतनी जल्दी खाद नहीं बना सकती,

जितनी जल्दी मांग बढ़ जाती है।

यही वजह है कि: हर सीजन में खाद की कमी का शोर मचता है।

दुकानदार की मजबूरी

दुकानदार सोचता है: – अगर मशीन से नहीं बेचूंगा तो फंस जाऊंगा

– अगर ज्यादा बेच दिया तो जांच होगी

– अगर स्टॉक पड़ा रहा तो कंपनी फोन करेगी

इसलिए कई बार मजबूरी में कहता है –

“आज खाद नहीं है।”

किसान की मजबूरी

किसान सोचता है: – खेत में बीज डाल दिया

– पानी दे दिया

– खाद नहीं मिली तो नुकसान होगा,इसलिए वह गुस्सा करता है:-

जबकि असली कारण: 👉 सिस्टम

👉 सप्लाई

👉 सरकार

👉 कंपनी

सब मिलकर बनाते हैं।

समाधान क्या हो सकता है?

अगर खाद की कमी कम करनी है तो:

1️⃣ सरकार सब्सिडी नीति साफ करे

2️⃣ यूरिया के रेट पर दोबारा सोचे

3️⃣ कंपनियों को आयात में मदद मिले

4️⃣ मशीन और इंटरनेट ठीक हो

5️⃣ किसान समय पर पंजीकरण करे

6️⃣ कालाबाजारी पर सख्ती हो

तभी यह समस्या कम होगी।

निष्कर्ष

खाद की कमी सिर्फ दुकानदार की गलती नहीं है।

यह एक पूरी श्रृंखला की समस्या है –

सरकार → कंपनी → सप्लाई → दुकानदार → किसान

अगर एक कड़ी भी कमजोर हुई तो कमी बन जाती है।

इसलिए: -किसी एक को दोष नहीं देना चाहिए


FAQs – खाद की कमी से जुड़े सवाल

1. खाद की कमी क्यों होती है?

खाद की कमी सरकार की सब्सिडी नीति, कंपनियों की सीमित सप्लाई, आयात में देरी, मशीन और आधार आधारित बिक्री सिस्टम और एक साथ बढ़ी मांग के कारण होती है।

2. यूरिया की कीमत 266 रुपये ही क्यों है?

सरकार यूरिया पर भारी सब्सिडी देती है, इसलिए इसकी कीमत लंबे समय से 266 रुपये रखी गई है ताकि किसानों को सस्ती खाद मिल सके।

3. डीएपी और पोटाश महंगी क्यों हो जाती हैं?

डीएपी और पोटाश का कच्चा माल विदेश से आयात होता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में दाम बढ़ने और डॉलर महंगा होने से इनकी कीमत बढ़ जाती है।

4. ब्लैक में यूरिया क्यों बिकती है?

जब बाजार में यूरिया की सप्लाई कम होती है और मांग ज्यादा होती है, तब कुछ लोग इसका फायदा उठाकर इसे महंगे दाम पर बेचते हैं, जिसे ब्लैक मार्केटिंग कहा जाता है।

5. POS मशीन से खाद बिक्री में क्या समस्या आती है?

अगर इंटरनेट नहीं चलता, मशीन खराब हो जाती है या आधार सत्यापन नहीं होता, तो स्टॉक होने के बावजूद खाद की बिक्री नहीं हो पाती।

6. क्या कोरोना और युद्ध का खाद की सप्लाई पर असर पड़ा?

हाँ, कोरोना महामारी और अंतरराष्ट्रीय युद्धों के कारण फैक्ट्रियां बंद हुईं और जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई, जिससे खाद का आयात कम हुआ।

7. खाद की कमी से किसान को क्या नुकसान होता है?

खाद समय पर न मिलने से फसल की पैदावार कम हो जाती है, जिससे किसान को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।

8. खाद की कमी का समाधान क्या हो सकता है?

सरकार को सब्सिडी नीति सुधारनी चाहिए, कंपनियों को आयात में मदद करनी चाहिए, मशीन और इंटरनेट सिस्टम को मजबूत करना चाहिए और कालाबाजारी पर सख्ती करनी चाहिए।





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