10 बेटियों के बाद बेटा: हरियाणा के जिंद जिले की वायरल खबर ने समाज को क्या सोचने पर मजबूर किया?
हरियाणा की वायरल खबर इन दिनों देश और दुनिया में चर्चा का विषय बनी हुई है। यह जिंद जिले की घटना केवल एक सामान्य समाचार नहीं है, बल्कि एक ऐसी real incident story in Hindi है जो समाज की सोच पर गहरे सवाल खड़े करती है। कई बार कोई घटना समाज के अंदर ही अंदर चलती रहती है, लेकिन जैसे ही वह बाहर आती है, वह एक बड़ा मुद्दा बन जाती है।
हाल ही में हरियाणा न्यूज में सामने आया कि जिंद जिले के एक दंपत्ति ने अपने 11वें बच्चे के रूप में बेटे को जन्म दिया है। जैसे ही यह बात लोगों तक पहुंची, हर किसी के मन में यही सवाल उठा कि आखिर ऐसी क्या मजबूरी रही होगी कि एक परिवार को 11 बच्चों तक जाना पड़ा।
इस घटना के पीछे की सच्चाई
इस मामले की सच्चाई यह है कि इस दंपत्ति को पहले तक बेटा नहीं हुआ था। उनके पहले 10 बच्चे सभी बेटियां थीं। 10 बेटियों के बाद बेटा होने की यह घटना इसलिए चर्चा में आई क्योंकि बेटे की चाह में उन्होंने 11वीं बार संतान का निर्णय लिया। बताया जा रहा है कि उनकी शादी को करीब 20–21 साल हो चुके हैं और महिला की उम्र लगभग 38 वर्ष है। अच्छी बात यह है कि डिलीवरी सामान्य हुई और मां व बेटा दोनों स्वस्थ हैं।
यह खबर सामने आते ही इस पर सकारात्मक और नकारात्मक दोनों तरह की प्रतिक्रियाएं आने लगीं।
गांव और शहर की सोच में फर्क
मेरे अनुसार अगर इस घटना को ग्रामीण समाज की सोच से देखा जाए, तो यह कोई बहुत असामान्य बात नहीं लगती। गांवों का इतिहास रहा है कि पहले 5–6 बच्चों का होना सामान्य माना जाता था। लेकिन आज के समय में जब मीडिया और सोशल मीडिया के कारण हर खबर तेजी से फैलती है, तो यही मामला हरियाणा की वायरल खबर बन गया।
आज हर जगह यह कहा जाता है कि बेटा बेटी समान हैं। इसी वजह से इस घटना को लेकर यह बहस शुरू हो गई कि कहीं इससे यह संदेश तो नहीं जा रहा कि बेटियों की कीमत बेटों से कम आंकी जा रही है।
आर्थिक और सामाजिक सवाल
एक बड़ा सवाल यह भी उठता है कि परिवार की आर्थिक स्थिति कैसी है। बहुत से लोगों का कहना है कि जब परिवार आर्थिक रूप से मजबूत नहीं है, तो 11 बच्चों की परवरिश कैसे होगी। यह चिंता अपनी जगह सही है, लेकिन दूसरी ओर गांव के कुछ लोगों का मानना है कि बेटे की चाह समाज में आज भी सामान्य मानी जाती है और इसे सीधे बेटियों का अपमान कहना भी पूरी तरह सही नहीं होगा।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि इस परिवार ने कभी भी भ्रूण हत्या या लिंग जांच जैसे अपराध का सहारा नहीं लिया। उन्होंने अपने सभी बच्चों को जन्म दिया। इसी वजह से कई लोगों ने उन्हें आर्थिक सहायता भी दी — किसी ने नकद राशि दी, तो किसी ने बच्चों के लिए राशन और देसी घी दिया।
समाज की दोहरी सोच
मुझे व्यक्तिगत रूप से इसमें यह बात खटकती है कि समाज कमजोर और गरीब लोगों को जल्दी निशाना बनाता है। जब कोई आम परिवार ऐसा करता है, तो उस पर सवाल उठते हैं। लेकिन बड़े शहरों और फिल्मी दुनिया में जब लोग दो से ज्यादा शादियां करते हैं या ज्यादा बच्चे पैदा करते हैं, तो उसे “आधुनिक सोच” या “वेस्टर्न कल्चर” कहकर नजरअंदाज कर दिया जाता है।
हम एक तरफ बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ की बात करते हैं, लेकिन दूसरी तरफ ऐसी घटनाओं पर केवल आलोचना करके खुद को सही साबित करना चाहते हैं।
कानून क्या कहता है?
अब तक हरियाणा सरकार या भारत सरकार की तरफ से ऐसा कोई कानून नहीं है जो यह तय करे कि कोई व्यक्ति दो या तीन से ज्यादा बच्चे पैदा नहीं कर सकता। जब तक सरकार की तरफ से कोई स्पष्ट नियम नहीं है, तब तक किसी परिवार को केवल बच्चों की संख्या के आधार पर दोषी ठहराना मुझे सही नहीं लगता।
मेरा Point of View
मेरे अनुसार यह घटना हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि आज भी समाज में बेटे की चाह कितनी गहरी बैठी हुई है। साथ ही यह भी सच है कि इस परिवार ने कोई गैरकानूनी रास्ता नहीं अपनाया।
जरूरत इस बात की है कि:
बेटा बेटी समान की सोच को व्यवहार में लाया जाए
परिवार नियोजन पर लोगों को जागरूक किया जाए
और समाज कमजोर लोगों को निशाना बनाने के बजाय अपनी सोच पर काम करे
निष्कर्ष
जिंद जिले की यह घटना केवल एक परिवार की कहानी नहीं है, बल्कि यह पूरे समाज के सामने एक आईना है। यह घटना दिखाती है कि हम आधुनिक बनने की बात तो करते हैं, लेकिन सोच आज भी कहीं न कहीं पुराने ढांचे में अटकी हुई है।

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